नई दिल्ली
प्रयागराज का माघ मेला भारत की धार्मिक चेतना का प्रतीक भर नहीं है, बल्कि यह राज्य की प्रशासनिक क्षमता और लोकतांत्रिक संतुलन की भी एक बड़ी परीक्षा है। हालिया विवाद, जिसमें स्वयं को शंकराचार्य कहने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और माघ मेला प्रशासन आमने-सामने आए, इसी संतुलन को लेकर कई असहज प्रश्न खड़े करता है—ऐसे प्रश्न, जिनके उत्तर केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि विवेक और संवैधानिक जिम्मेदारी से दिए जाने चाहिए।
दुर्भाग्यवश, इस पूरे प्रकरण को एक प्रशासनिक प्रक्रिया के बजाय धार्मिक टकराव और राजनीतिक मंशा के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की गई, जिससे मूल मुद्दा पीछे छूटता चला गया।
आस्था का तर्क और उसकी सीमा
शंकराचार्य पद भारतीय सनातन परंपरा में अत्यंत सम्मानित माना जाता है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके समर्थकों का यह तर्क है कि ऐसे पद पर आसीन संत को माघ मेले जैसे आयोजन में विशेष सम्मान और स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, और प्रशासनिक नोटिस या प्रतिबंध धार्मिक गरिमा के विपरीत हैं।
यह तर्क भावनात्मक रूप से प्रभावशाली अवश्य है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी दावे की वैधता केवल भावना से तय नहीं होती। सार्वजनिक स्थानों और संसाधनों से जुड़े मामलों में आस्था को सम्मान मिल सकता है, पर वह स्वतः अपवाद का अधिकार नहीं बन जाती।
प्रशासनिक दायित्व का यथार्थ
माघ मेला दुनिया के सबसे बड़े मानव समागमों में से एक है। करोड़ों श्रद्धालुओं की सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन, आपातकालीन सेवाओं और निर्धारित मार्गों का पालन—ये सभी प्रशासन की गैर-परक्राम्य जिम्मेदारियाँ हैं।
यदि कोई भी व्यक्ति, चाहे उसका धार्मिक प्रभाव कितना ही व्यापक क्यों न हो, निर्धारित नियमों से हटकर आगे बढ़ता है, तो प्रशासन की चुप्पी कर्तव्य-त्याग मानी जाएगी। इस संदर्भ में नोटिस देना न तो धार्मिक हस्तक्षेप है और न ही असम्मान, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ा एक अनिवार्य कदम है।
विवाद का मूल, जो अक्सर अनदेखा रहा
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का शंकराचार्य होना सर्वमान्य नहीं है। भारत में शंकराचार्य परंपरा चार मान्य पीठों, दीर्घकालिक परंपरा और व्यापक संत-समाज की स्वीकृति से जुड़ी है।
इस मामले में न केवल संत समाज के भीतर मतभेद हैं, बल्कि यह विषय न्यायिक प्रक्रिया के अधीन भी है। ऐसी स्थिति में राज्य द्वारा इस दावे को स्वतः मान्यता देना न तो तटस्थता के अनुरूप होगा और न ही संवैधानिक विवेक के।
राज्य का दायित्व है कि वह विवादित धार्मिक दावों से उचित दूरी बनाए रखे—यही उसकी निष्पक्षता की कसौटी है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर भ्रांति
इस प्रशासनिक कार्रवाई को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से जोड़कर देखने की प्रवृत्ति ने बहस को और भ्रमित किया है। योगी आदित्यनाथ केवल निर्वाचित मुख्यमंत्री नहीं हैं, बल्कि गोरक्षपीठ के महंत भी हैं—एक ऐसी परंपरा के उत्तराधिकारी, जिसकी वैधता, ऐतिहासिक निरंतरता और धार्मिक स्वीकृति पर कोई प्रश्न नहीं है।
उनकी धार्मिक पहचान न स्वघोषित है, न विवादित और न ही न्यायालय में विचाराधीन। ऐसे में किसी प्रशासनिक निर्णय को व्यक्तिगत धार्मिक पक्षपात के रूप में प्रस्तुत करना तथ्यात्मक रूप से कमजोर और वैचारिक रूप से सुविधाजनक निष्कर्ष है।
भाषा और विमर्श की गिरावट
इस प्रकरण में जिस प्रकार की व्यक्तिगत और ऐतिहासिक रूप से भड़काऊ भाषा का प्रयोग हुआ, उसने उस पक्ष की विश्वसनीयता को ही कमजोर किया है, जो स्वयं को परंपरा का रक्षक बता रहा है। संयम और गरिमा धार्मिक विमर्श की शक्ति रहे हैं; इनके अभाव में तर्क भी अपना प्रभाव खो देता है।
माघ मेला विवाद को धर्म बनाम राज्य के रूप में देखना एक सरलीकरण है। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या कोई धार्मिक पहचान सार्वजनिक व्यवस्था से ऊपर हो सकती है।
एक परिपक्व लोकतंत्र में उत्तर स्पष्ट है—नहीं।
धर्म सम्मान का पात्र है, पर अपवाद का नहीं।
प्रशासन उत्तरदायी है, पर असंवेदनशील नहीं।
इस संतुलन को बनाए रखना ही राज्य का दायित्व है। और यदि इस प्रक्रिया में कुछ असहज प्रश्न उठते हैं, तो उन्हें आस्था पर हमला मानने के बजाय लोकतांत्रिक अनुशासन की स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।
यही संतुलन भारत जैसे बहुलतावादी समाज की वास्तविक मजबूती है।